अँधेरों को गुज़र करने न दूँगी
मैं अपनी रौशनी बुझने न दूँगी
भले ही दौड़ में नफ़रत है आगे
मुहब्बत को मगर थकने न दूँगी
रखूँगी ध्यान इसका इस तरह मैं
कि जल्दी फूल को झरने न दूँगी
ज़मीं की मुख़्तलिफ़ कुछ ख़ूबियाँ हैं
ज़मीं को आसमाँ बनने न दूँगी
मैं गहरी नींद में जब तक न सोऊँ
मैं तब तक चाँद को ढलने न दूँगी
ख़ताएँ भी नज़र आएँ न तेरी
वो पर्दा आँख पर पड़ने न दूँगी
Dr. Sonroopa Vishal