बाँट रहे हो आज हमें तुम ख़ुशियों की सौगात मगर
ये बतलाओ कल तक हमको आख़िर लूट रहा था कौन
तन में जितना खून बचा था
वो भी सारा पी लेते
हम जैसे जीते आएं हैं
अब तक वैसे जी लेते
जब तक तुमने बंद नहर के पानी को खोला मालिक
तब तक तो मेरे खेतों के सूख गए सारे सागौन
तुम पर इक विश्वास किया था
उसका ये अंजाम हुआ
काम किसी का हुआ अगर तो
बस धनिकों का काम हुआ
आ जाते थे जब जी चाहे मन की बात बताने को
ये बतला दो अब तक फिर क्यों तुमने साध रखा था मौन
हम ग़रीब-गुरबों की नजरों में
क्या हो ये जान न पाए
एक तुम्हारे कह देने पर
हमने कितने दीप जलाए
चंद अमीरों के चक्कर में आकर हमको भूल गए
वरना इक राजा की ख़ातिर क्या है दिल्ली क्या जालौन
Anuj Abr