Subhash Ehsaas

देखती है सोचती है फिर भी मुस्काती नहीं है
बोलना तो चाहती है किंतु बतलाती नहीं है

हाथ कोई थामने को गर कहे तो थाम लेना
ऐसे मौक़े ज़िंदगी देती है दोहराती नहीं है

कुछ भी हो कैसा भी हो जो भी हो जैसा भी हो लेकिन
ज़िंदगी के क़ैदियों को मौत तो आती नहीं है

शहर में चिंगारी लेके फिरते हैं हम किन्तु दुष्यन्त
अब दिये में तेल से भीगी हुई बाती नहीं है

उसके नख़रे हम उठाते हैं तो हम ही जानते हैं
कौन कहता है वो लड़की इतनी जज़्बाती नहीं है

छूने भर से जो सिमट जाती थी अपने आप में ही
उसको अब आग़ोश में लें तो भी घबराती नहीं है
Subhash Ehsaas

Subhash Ehsaas | We The Sukhanwar