सिद्धान्त आदिश

ऐसे सजा रहें हैं उसे मेरे फन के हाथ
जैसे ग़ज़ल तराश रहे हों सुख़न के हाथ

पलकें झपक न पाओगे,एक दिन अगर मेरी
तस्वीर लग गयी जो तुम्हारे नयन के हाथ

माँ-बाप के जो साये निगहबान थे मेरे
कॉलर तलक न आये कभी भी तपन के हाथ

पत्थर बदन में एक जो शीशे की चीज़ थी
उस दिल को दिया किसी शीशा बदन के हाथ

कुछ दोस्त हैं जो मेरी हिफ़ाज़त में जीते जी
मुझ तक पहुँचने ही नहीं देंगे कफ़न के हाथ

पारे-सी लोच और बदन काँपने लगा
बारिश में जब भी सजनी ने सोचे, सजन के हाथ

ग़ज़लों ने हमको ऐसे दुलारा है बारहा
आँचल हो माँ का जैसे कि बड़की बहन के हाथ

धड़कन मेरी जो आपकी धड़कन से आ मिली
भावों का साथ देने लगे व्याकरण के हाथ

मुद्दत से ये ज़माना जिन्हें ख़ोजता रहा
वो ख़ुद न थाम लें मेरे अन्तःकरण के हाथ

भटकाव तो बहुत थे मगर ध्यान जब किया
कस्तूरी तक तो आ ही गए मुझ हिरन के हाथ

'आदिश' थे रास्ते में लुटेरे बहुत मगर
ख़ाली नहीं हुए मेरे चिंतन-मनन के हाथ
सिद्धान्त आदिश

सिद्धान्त आदिश | We The Sukhanwar