सुनने भर का खेल नहीं हैं ।
बस शब्दों का मेल नहीं हैं ।।
मन की सहज भावना के उन्नायक हैं ।
गीत हमारी संस्कृति के परिचायक हैं ।।
लोक वेदना को स्वर देने वाले हैं ;
अंधकार को हरते हुए उजाले हैं ।
ये हैं छाँव घनी, बरगद के पेड़ों की ;
स्नेह सुधा के मस्त छलकते प्याले हैं ।।
लोरी हैं माँ की ममता की ।
सीमा मानवीय समता की ।।
जीवन के उन्मुक्त भाव के गायक हैं ।
गीत हमारी संस्कृति के परिचायक हैं ।।
ख़ुशी अनूठे रूप सजाती गीतों में ;
दुलहिन की मेंहदी रँग लाती गीतों में ।
मधुर मिलन में मीत गीतमय हो जाते ;
पिय वियोग विरहिणी सुनाती गीतों में ।।
सुख-दुःख धीर-अधीर प्रेम में ।
प्रिय से उसके कुशलक्षेम में ।।
नेह-निमंत्रण के ये सिद्ध विनायक हैं ।
गीत हमारी संस्कृति के परिचायक हैं ।।
मातृभूमि हित सदा समर्पित रहते हैं ;
बलिदानों की अमर कथाएँ कहते हैं ।
सैनिक के साहस को नयी प्रेरणा दे ;
बनकर गूँज रक्त के सँग-सँग बहते हैं ।।
राष्ट्रगीत में, राष्ट्रगान में ।
बसें देश के स्वाभिमान में ।।
संकट में ये जय के शुभ फल दायक हैं ।
गीत हमारी संस्कृति के परिचायक हैं ।।
भक्ति-भाव से निहित प्रार्थना ये ही हैं ;
मंत्रसिद्धि में निरत साधना ये ही हैं ।
एकाकार करें जो साँसों की लय को ;
परमशक्ति के साथ, भावना ये ही हैं ।।
काट कुटिल माया के बन्धन ।
पाप रहित कर साधक का मन ।।
जन्म-मरण के छल से मुक्ति प्रदायक हैं ।
गीत हमारी संस्कृति के परिचायक हैं ।।
Mukesh Kumar Upadhyay