दिल मेरा ये कर रहा इकरार है
झूठ लगता हर घड़ी ये प्यार है
प्यार की बातों में आके फँस गए
लग रही अब तिश्नगी गुलज़ार है
शब के दामन में सुकूँ पाऊँ सदा
ये दरख़्शाँ बेक़सी अब यार है
धूप में मिलती हैं मुझको राहतें
छाँव करती हर घड़ी बस वार है
प्यार तो करता था मैं भी जान से
जान अब मुझको मेरी दुश्वार है
कर रहा ये “राज” ख़ुद से बात ये
हो गई ये ज़िंदगी बीमार है
नीरज पाण्डेय “राज”