Asad Khan Lakhimpuri (Barwar)

आज़ फ़िर उनकी ख़ूबरू आँखें
कर रहीं किस की जुस्तजू आँखें

अपने दामन में हैं छुपाए हुए
कितनी उम्मीद-ओ-आरज़ू आँखें

खो गया है कहीं कोई शायद
ढूंढती हैं जो चार - सू - आँखें

ज़ख़्म ऐसा दीया है अपनो ने
हो रहीं हैं लहू - लहू आँखें
Asad Khan Lakhimpuri (Barwar)

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