दहशत में हूँ कहीं के मुझे प्यार हो न जाए
इस दौर में ये दिल कहीं बीमार हो न जाए
मिलता नहीं मैं उन से इसी खौफ़ से कभी
आँखो से मेरे इश्क़ का इज़हार हो न जाए
आ तो गया हूँ यारों मैं उनकी गली में आज
डरता हूँ के रक़ीबों से तक़रार हो न जाए
दिल और दिमाग दोनों को है फिक्र इस कदर
गफ़लत में मेरे लब से भी इक़रार हो न जाए
वहशत मे धडकनें हैं दिन रात क्या करें
सासें ये मेरी खुद से ही बेज़ार हो न जाए
देखा है मैंने इश्क़ का अंज़ाम दोस्तों
साज़िश मेरे खिलाफ़ मेरे यार हो न जाए
कैसे कहूँ के उनसे मुहब्बत नहीं अजय
गुरवत हमारे दरमियां दीवार हो न जाए
AJAY PRASAD