ज़माने की निगहबानी में हैं हम
परेशाँ हैं परेशानी में हैं हम
उसे आसान लगती है ये दुनिया
उसे लगता है आसानी में हैं हम
तिरी आँखें बताती हैं मुसलसल
कई आँखों की निगरानी में हैं हम
जहाँ भी देखिए जंगल समझिए
वही हैं और फ़रावानी में हैं हम
मोहब्बत ध्यान रखती है हमारा
कि हैं बेहोश बे-ध्यानी में हैं हम
बनानी है नयी बुनियाद अपनी
फक़त इक लफ़्ज़ जिस्मानी में हैं हम
भले सहराओं जैसे दिख रहे हैं
प सर से पाँव तक पानी में हैं हम
अभी बस देखिए इक लफ़्ज़-ए-सूरत
कि जिसको देख हैरानी में हैं हम
हसीनों छोड़कर दुनिया तुम्हारी
बहुत खुश हैं बयाबानी में हैं हम
कहाँ तुम ख़्वाब की सूरत हो मुझ में
कहाँ इक जिस्म-ए-सामानी में हैं हम
बिछड़ कर खुश नहीं हैं यार तुमसे
कि ज़िंदा हैं पशेमानी में हैं हम
Nivedan Mishra