हम चले आऐ हैं सब तेरे सहारे छोड़ कर
अपनी सारी ख़्वाहिशों को इक किनारे छोड़ कर
कैमरे में क़ैद है सारे सफ़र की दास्ताँ
दर्द, आँसू, ज़ख़्म, आहों के नज़ारे छोड़ कर
एक पल में आग बन कर दश्त को खा जाऐंगे
ना-मुनासिब है चले जाना शरारे छोड़ कर
एक भँवरा इश्क़ में कुछ ऐसा दीवाना हुआ
सहरा सहरा फिर रहा है बाग़ सारे छोड़ कर
सब से हँस कर मिल रहे हैं आज भी यानी के वो
सब के होते जा रहें हैं ! बस हमारे छोड़ कर
इज़्न साहिल एक बोसे का मिला था इस लिए
हम ने पेशानी चुनी है लब तुम्हारे छोड़ कर
Shashank Singh Thakur "SAAHIL"