चाहत जो दिल में है उठी तेरे ही तो ख़ुमार की
चेहरे पे मेरे रौनकें तिश्ना चमन-ओ-बहार की
देखा तमाम शब कोई रस्ता बड़ी निशात से
तू जो नहीं है पास तो उल्फ़त है शर्म सार सी
आँखों में जो बहाल है तेरी वफ़ा का पास है
आँखें हुई हैं वैसे अब मेरी तो ग़म ग़ुसार सी
बढ़ते हुए चला न था निस्बत का हमको भी पता
बातों से बात बढ़ गई दिल में तेरे शुमार की
तुझको सकूं न मिल सका ये भी तो एक मर्ज़ था
उनसे मिलेगी अब शिफा ’नीरू’ तुझे करार की
Neeru Talwar