गुरचरन मेहता 'रजत'

राग छेड़ा मधुर मखमली शाम ने
दिल में कर दी है इक खलबली शाम ने

चाँद कहने लगा वो तो मदहोश है
छू लिए उसके लब साँवली शाम ने

छाँव करने लगी मुझसे अठखेलियाँ
धूप की हर अदा छीन ली शाम ने

है मुकद्दस नज़र मेरे महबूब की
खोल दी उसकी हर कुंडली शाम ने

जब से सजने लगीं महफिलें शाम को
सीख ली मैकशी दिलजली शाम ने

इश्क़ संदल की खुशबू के जैसा ही है
मन को तर कर दिया संदली शाम ने

जो गई इक दफ़ा मिल न पाई सहर
छान ली है 'रजत' हर गली शाम ने
गुरचरन मेहता 'रजत'

गुरचरन मेहता 'रजत' | We The Sukhanwar