हिन्दी से ही जग उजियारा, हिन्दी से सम्मान,
हिन्दी का जयगान करें हम हिन्दी का जयगान।
अक्षर जब दीपक बनते
मन में उजियारे छनते
शब्दों से संदेश मिलें जब
पंक्तियों पर सुर खिलें तब
भाषा से जग आलोकित हो, गूँजे भारत-गान,
हिन्दी का जयगान करें हम हिन्दी का जयगान।
जब भी भाषा राहें रूठें
स्वर मुस्कानों से जब छूटें
ध्वनि अगर मन्दिर बन जाये
अर्थ कहीं नभ तक पहुँचाये
बिखरे भाव को जोड़ बनाना
कविता का आँगन सजाना
हर दिशा में गूँजे इसकी, मधुरिम वाणी-गान,
हिन्दी का जयगान करें हम हिन्दी का जयगान।
बोल नयन के जब थम जाएँ
शब्द अधर से निकल न पाएँ
मन में छुपे भाव अकेले
ढूँढें कोई अपने मेले
तब तुम हिन्दी स्वर बनाना
ख़ामोशी में राग सजाना
जैसे सरिता गुनगुन गाये, संस्कृति करती गान,
हिन्दी का जयगान करें हम हिन्दी का जयगान।
जब भी चाहो रंग नए हों
अक्षरों के पंख खुले हों
ज्ञान को गागर बनाना
हर क्षण को उत्सव बनाना
मिलकर देना साथ हमारा
लिखना फिर इतिहास हमारा
हर धड़कन में गूँजे केवल हिन्दी मधुरिम गान,
हिन्दी का जयगान करें हम हिन्दी का जयगान।
Dayanand Tripathi Vayakul