डाॅ. सोमनाथ शुक्ल

थकानें दिन की ले हम रात को घर पर ठहरते हैं
कि जैसे शाख पर थक-हारकर पंछी उतरते हैं

वफ़ा की गर्मियाँ लहज़े की ठंडक प्यार की बारिश
हमारे दर से हो करके कई मौसम गुज़रते हैं
डाॅ. सोमनाथ शुक्ल