थकानें दिन की ले हम रात को घर पर ठहरते हैंकि जैसे शाख पर थक-हारकर पंछी उतरते हैंवफ़ा की गर्मियाँ लहज़े की ठंडक प्यार की बारिशहमारे दर से हो करके कई मौसम गुज़रते हैंडाॅ. सोमनाथ शुक्ल