अंधियारे गगन तले, व्याकुल दीप जलाना है
भटके इस सफ़र में फिर, ख़ुद को ही पाना है
पल-पल का जीवन जैसे, रेत की धारा है
सपनों के महल सभी, ढहते दुबारा हैं
मन के पिंजरे में बंदी, आशाएँ हारे हैं
सिंहासन के मद में डूबे, राजा ठोकर मारे हैं
सत्ता का भरोसा क्या, क्षण में छूट जाना है
अंधियारे गगन तले, व्याकुल दीप जलाना है
शोहरत के पीछे क्यों, दौड़ रहा इंसान है
मुट्ठी में न आएगा, छूटेगा सब सामान है
सच्चा जो साथ निभाए, वह केवल सद्गुण है
बाकी सब आभास हैं, जैसे झूठा समय-गुण है
तन का महल भी तो, इक दिन मिट जाना है
अंधियारे गगन तले, व्याकुल दीप जलाना है
न धन रहेगा तेरा, न यश रहेगा तेरा
बस कर्म की छाया ही, देगी तुझे सवेरा
मत चिंता कर जग की, मत रो भाग्य अपना
ले पतवार विश्वास की, हरि को बना ले सपना
मंज़िल कहाँ है पूछे, मन को समझाना है
अंधियारे गगन तले, व्याकुल दीप जलाना है
Dayanand Tripathi Vayakul