Hritwik

साँसों में बसाये पाक फ़िज़ा होठों से शरारत करती है
गेसू में सिमटता जाता हूँ बाहों में सलामत करती है

तासीर गुलिस्तानी उसका अंदाज़-ए-बयाँ नग़्मा-ज़ाई
गाती है फूल बिखरते हैं ख़ुशबू की निज़ामत करती है

गुस्ताख़ कमर पुरज़ोर लचक चलती है नहीं बलखाती है
सुनते ही वज़ाहत महबूबा चलने से बग़ावत करती है

वो शोख़-तबा' आज़ाद-हँसी जुल-बाज़ इरादा बे-परवा
ज़ुल्फ़ों की लहर बेक़ैद भले मुखड़े से क़यामत करती है

नासाज़ तबी'अत हो मेरी सज्दे में मुकम्मल दिन उसका
सोती है घड़ी भर झटके से उठती है इबादत करती है

लड़ती है शोला लगती है इक बार डपट देने पर बस
अश्कों से नहाये चंदा को हाथों की अमानत करती है

यादों में छिपाकर रखती है अनबन की कहानी हा-ए-ख़ुदा
आँखों को घुमाती रहती है कमरे को अदालत करती है
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