कवि दयानन्द त्रिपाठी व्याकुल

मिटा वैभव,गई दौलत, न कोई साथ रहता है
अकेला मन तड़पता है बुढ़ापे के फ़साने में
कवि दयानन्द त्रिपाठी व्याकुल