विनती मेरी भी सुन लीजे
हे जगजननी मंगल कीजे
खड़े हैं कब से द्वार तुम्हारे
अपने दोनों हाथ पसारे
हमको भी अब तो वर दीजे
हे जगजननी...
मन का मेरे भी पट खोलो
साथ मेरे हे मां तुम हो लो
कष्ट मेरे अब सब हर लीजे
हे जगजननी...
ज्ञान की ज्योत जला दो मन में
प्रेम ही बरसे अब जीवन में
हर दिल में मेरा घर कीजे
हे जगजननी...
सांस सांस में ही सुमिरन हो
तुझमें ही डूबा तन मन हो
अब मुझको अपना कर लीजे
हे जगजननी...
सबका घर परिवार सुखी हो
नहीं कोई भी कहीं दुखी हो
सुख से हर झोली भर दीजे
हे जगजननी...
Shravan Kumar