उतरे थे गोद से अभी, भागे, निकल गए
बच्चे हमारी सोच से आगे निकल गए
दिखता बहुत हसीन था ख़्वाबों का पैरहन
पहनूँ कि इससे पहले ही धागे निकल गए
दुनिया की ख़्वाब-गाह में बेसुध पड़े हैं हम
जिस-जिसकी नींद टूटी, वो जागे, निकल गए
रहमत तो ख़ैर सबको बराबर अता हुई
हम चंद ऐसे लोग अभागे निकल गए
Satyendra Bharill