Archana Dwivedi

श्वेत वसन माँ भारती,कर दो यह उपकार।
रस,छंदों की साधना,हो मेरा संसार।।

तृष्णा माया मोह में उलझी है यह देह।
कृपा करो वागेश्वरी, हो मेरा उद्धार।।

जाति धर्म से हो परे, मेरा मानस ज्ञान।
पीड़ा सबकी बाँट लूँ, जग में भर दूँ प्यार।।

कर तेरी आराधना,मूर्ख बने विद्वान।
वीणा जीवन में करे,भावों का संचार।।

बंधन सारे तोड़कर,तुमसे जोड़ी प्रीत।
नित्य अर्चना कर रही, माँ मै सौ-सौ बार।।
Archana Dwivedi