छूट जाएं न वर्षों के रिश्ते कहीं
इसलिए नासमझ हम बने रह गए
हम पिरोते रहे मोतियां प्रेम की
वो विमुखता की गांँठें लगाते रहे
प्रेम देने से सबको मिला प्रेम है
हम अभागे सदा खार पाते रहे
मन में बदलाव की एक आशा लिए
यातनाएं सभी बेधड़क सह गए
छूट जाएं न वर्षों के रिश्ते कहीं
इसलिए नासमझ हम बने रह गए
बेदखल कर रहे हैं हमें अब वही
हमने अंतस में अपने जिन्हें ठाँव दी
वो शजर काटने पर तुले निर्दयी
जिस शजर ने उन्हें आजतक छाँव दी
आंसुओ की हमारे कदर ना हुई
जो भी अरमान थे व्यर्थ ही बह गए
छूट जाएं न वर्षों के रिश्ते कहीं
इसलिए नासमझ हम बने रह गए
Sani Singh