बेअदब दुनिया है भूली बंदगी को
कौन देगा मात अब इस तीरगी को
माँगने से ये कभी मिलता नहीं है
छीनना पड़ता है अपना हक़ सभी को
लग रहा बेहद भला वो देखने में
रूप से आँका गया है आदमी को
हार को तक़दीर कहना लाज़िमी था
कौन बतलाए भला अपनी कमी को
मर रही दुनिया दिखावे के लिए ही
कौन अपनाता है दिल से सादगी को
बेख़ुदी में उम्र को अपनी गँवा कर
आख़िरी में ढूँढते हैं ज़िंदगी को
Sani Singh