अंतिम क्रंदन कौन बनेगा

जितनी उत्तम आशा होगी उतना रुचिकर कष्ट मिलेगा,
क्या जाने मन की करुणा का अंतिम क्रंदन कौन बनेगा।

भूली बिसरी जितनी यादें सब आती एकाकीपन में
कर्तव्यों का बोध उमड़ता सुख से दूर रिक्त इस मन में।
लाखों शपथ कोटि निर्णय ले कहता मन अब नहीं करेंगे
अब तो लक्ष्य सिद्ध जिससे हो वही नित्य नित काम करेंगे।

किन्तु पुनः उनके दिखते ही सुमिरन इसका किसे रहेगा
क्या जाने मन की करुणा का अंतिम क्रंदन कौन बनेगा।

स्यात् बोध हो कभी हमें सार्थक कण जीवन जीने का,
असफलताएं त्याग त्यागकर सफल अमिय वारि पीने का
पर अमृत की बूंदों का हम मूल्यांकन कैसे कर पायेंगे,
जब तक असफलताओं के विष बूंद कंठ में न जायेंगे।

पर उनके इक मंद हंसी के आगे इनको कौन रखेगा।
क्या जाने मन की करुणा का अंतिम क्रंदन कौन बनेगा।

जिनको मात्र देख लेने से सारी पीड़ाएं धूमिल हों,
इतना सुंदर भाव बने तो उनको ईश्वर कह सकते हैं
जब स्वांसो से मूल्यवान उनका वह चेहरा हो जाए,
सब कुछ फिर चाहे जैसा हो उनके बिन क्या रह सकते हैं।

किंतु वही भगवान चला जाए मन के मंदिर से उठकर,
उजड़ चुके बीहड़ मंदिर में फिर कोई भगवान बसेगा।
क्या जाने मन की करुणा का अंतिम क्रंदन कौन बनेगा।।
Arun Kumar Shukla

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