न जो बदली गई तासीर मेरी
बढ़ा दी जाएगी ताज़ीर मेरी
यही मैं सोचता रहता हूँ अक्सर
कहाँ ले जाएगी तक़दीर मेरी
रिहा हो ही चुका था ख़्वाब में मैं
किसी ने छेड़ दी ज़ंजीर मेरी
मैं डूबा था ख़यालों में तुम्हारे
किसी ने खेंच ली तस्वीर मेरी
तेरी यादें ही सरमाया है मेरा
लुटेरे ले गए जागीर मेरी
भले तुम काट दो मेरी ज़ुबां पर
मिटा सकते नहीं तहरीर मेरी
वो चाहे झूठ ही हो या वो सच हो
मगर चलती रहे तक़रीर मेरी
मैं रांंझा देखता ही रह गया बस
बदल गई कठघरे में हीर मेरी
'इनायत' इश्क़ कर बैठे थे तुमसे
यही ग़लती रही आख़ीर मेरी
INAYAT ALI CHISHTI