वो सुब्हो बनारस की बेला वो अवध के जैसी शाम कहाँ
वो मात -पिता से भी बढ़कर इस जग में कोई धाम कहाँ
ये मेरी छोटी सी कुटिया लगती है जैसे राजमहल
उस ऊँची महल - अटारी में इसके जैसा आराम कहाँ
ये काव्य सृजन के भाव मेरे सब अंतर्मन के साक्षी हैं
हर दुःख के साथ खड़ा होना अब इससे अच्छा काम कहाँ
सबरी के झूठे बेरों में, हर इंसां में, हर इक दिल में
हर शय में बसते राम सदा फिर क्यों कहते हो राम कहाँ
रसखान ,कबीरा ,सूर , सहर, तुलसी ने ढूढ़ा जीवन भर
जीवन भर ढूढ़ रही मीरा पद में मेरे घनश्याम कहाँ
Shivsagar Sahar