दो घड़ी प्यार जताता है चला जाता है
वो मुझे यार बनाता है चला जाता है
चुगने देता है परिंदो को भले हर दाना
फिर वहाँ जाल बिछाता है चला जाता है
रोज़ आता वो मेरे दुःख में सियासत करने
ख़ुद को हमदर्द बताता है चला जाता है
चूक होती नही उसका भी यही कारन है
तीर आँखों से चलाता है चला जाता है
आप तो ख़ैर तवज्जो भी नही देते हैं
वो भले हाथ मिलाता है चला जाता है
धूप में देर से चलते हुए थक जाता है
फिर भी वो पाँव बढ़ाता है चला जाता है
Shivsagar Sahar