Shivsagar Sahar

ख़ुद को पहले कँवल बनाना पड़ता है
फिर दलदल में पाँव जमाना पड़ता है

चाहे जितना काम ज़रूरी हो लेकिन
पहले उसका फ़ोन उठाना पड़ता है

आसानी से दाल कहाँ गल पाती है
इश्क़ में ऊँचा मोल चुकाना पड़ता है

वो देवी है ऐसे-कैसे होगी ख़ुश
मंदिर में फल-फूल चढ़ाना पड़ता है

अपनी माँगें हाकिम तक पहुँचानी हो
उसकी ख़ातिर शोर मचाना पड़ता है
Shivsagar Sahar