कहीं मिलते हुये पर्वत गगन से
कहीं मिलती हुयी गंगा जमन से
है ऐसे ही हमें उल्फ़त वतन से
हो रग़बत जैसे भँवरे को चमन से
बदन में है हमारे इस की मिट्टी
मोहब्बत है हमें अपने वतन से
ना दिल से ख़त्म हो तेरी मोहब्बत
अगरचे सर जुदा हो जाये तन से
कभी भी आज़मा लेना हमें तू
हैं क़ुरबाँ तुझ पे तन, मन और धन से
फिर आया जश्न-ए-आजादी का मौक़ा
सजे हैं घर , गली , कूंचे दुल्हन से
हमें प्यारा है अपना मुल्क फ़ैसल
नहीं मतलब है कुछ लाल ए यमन से
Faisal Qadri Gunnauri