Waseem Siddharthnagari

ये दिल उस के ज़ेर-ए-असर ही रहा
जिधर वो रहा, मैं उधर ही रहा

उसे है मरज़ इश्क़ का इसलिए
दवा का असर, बेअसर ही रहा

ख़िरदमंद होकर है क्या फ़ायदा
जो हर हाल में फ़ित्ना-गर ही रहा

मैं बुझता गया रात-दिन हर घड़ी
वो जलता हुआ इक शरर ही रहा

उजाले की थी आरज़ू रात भर,
मगर चाँद भी मुख़्तसर ही रहा

सितारों से आगे था मैं ख़्वाब में
जो आँखें खुलीं मेरी घर ही रहा
Waseem Siddharthnagari