कभी शीशा कभी खंजर रहा हूँ
मैं राहـएـइश्क़ का पत्थर रहा हूँ
मैं क्यूँ परछाईओं से डर रहा हूँ
किसी साये का पिछा कर रहा हूँ
मुझे भी इक नज़र अब देख आकर
मैं अब फुरक़त में तेरी मर रहा हूँ
वो मुझ से देखिये बरहम हुये हैं
मैं दम चाहत का जिनकी भर रहा हूँ
उतर आये वो मेरी दुश्मनी पर
मैं जिन का हामी ओ यावर रहा हूँ
फिरा हूँ जूस्तजू में तेरी दर दर
मैं घर होते हुये बे घर रहा हूँ
मैं खुद मिट्टी का पुतला हूँ ए फ़ैसल
मगर दुनिया मैं कूज़ागर रहा हूँ
Faisal Qadri Gunnauri