चले हैं कभी वो नज़र को झुकाए
कभी पास मेरे वो बेपर्दा आए
वो जब अपने चेहरे से पर्दा उठाए
ख़ुदा जाने क्यों मेरा दिल काँप जाए
ये हिम्मत है किस मेंए जो नज़रे मिलाए
रहे चाँद सूरज भीए पलकें बिछाए
क़यामत को देखा क़यामत से पहले
वो जब भी नज़र आये घूँघट उठाए
यकीं है के आने से तेरे चमन में
कली खिल उठी और गुल मुस्कुराए
यही है तमन्ना यही आरज़ू है
तुझे गर मैं भूलूँ मुझे मौत आए
परेशाँ है आतिश इसी कशमकश में
उसे याद रक्खे या फिर भूल जाए
Aatish Muradabadi