हरिफों से तरफ़दारी तुम्हारी
हमें महंगी पड़ी यारी तुम्हारी
अयाँ होने लगी है रफ़्ता रफ़्ता
रुमूज़-ए-इश्क़ ओ तह-दारी तुम्हारी
नहीं आता है दिल का दर्द लब पर
अयाँ होती है ख़ुद्दारी तुम्हारी
उसे समझो मुक़द्दर का सिकंदर
जिसे मिल जाए अलमारी तुम्हारी
के मेरे बाद भी तन्हा नहीं हो
ये मेरे दिल सेे हुशियारी तुम्हारी
कभी हो रूबरू तो हम भी देखें
कहाँ तक है अदाकारी तुम्हारी
ग़ज़ल में कर दिया ग़म का इहाता
यही है फ़ैज़ फ़नकारी तुम्हारी
Dard Faiz Khan