लोग मिलते रहे फिर बिछड़ते रहे
इस तरह प्यार को हम तरसते रहे
ये हृदय रेत का इक घरौंदा हुआ
रोज़ बनते सँवरते बिखरते रहे
मयकदे का नशा बेअसर ही रहा
याद में ही क़दम ये बहकते रहे
हम उन्हें प्यार का देवता क्यूँ कहें?
जो ठिकाने हर इक दिन बदलते रहे
आसमाँ के सितारे उन्हें सौंपकर
जुगुनुओं के लिए हम भटकते रहे
Archana Dwivedi