Mahesh Kumar Kuldeep

कि मुझमें जो भी था उम्दा कमी ने काट दिया
मेरे हुनर को मेरी मुफ़लिसी ने काट दिया

हर एक शख़्स का अपना वक़ार होता है
किसी ने जोड़ के रक्खा किसी ने काट दिया

हमारी ज़ात का सूरज कभी चमकता था
हमारी ज़ात को अफ़्सुर्दगी ने काट दिया

रिवाज़ रस्म रवायत समाज कुनबा लोग
दरख़्त इश्क़ का मिलकर सभी ने काट दिया

वगरना ज़िंदगी से हर हिसाब हो जाता
बस ऐन वक़्त पे फंदा किसी ने काट दिया

हमारे रब्त को हम वक़्त दे नहीं पाए
हमारे रब्त को इस ख़स्तगी ने काट दिया

वो जी रहा है हमारे बग़ैर भी 'कुलदीप'
उसी की बात को आख़िर उसी ने काट दिया
Mahesh Kumar Kuldeep

Mahesh Kumar Kuldeep | We The Sukhanwar