कि मुझमें जो भी था उम्दा कमी ने काट दिया
मेरे हुनर को मेरी मुफ़लिसी ने काट दिया
हर एक शख़्स का अपना वक़ार होता है
किसी ने जोड़ के रक्खा किसी ने काट दिया
हमारी ज़ात का सूरज कभी चमकता था
हमारी ज़ात को अफ़्सुर्दगी ने काट दिया
रिवाज़ रस्म रवायत समाज कुनबा लोग
दरख़्त इश्क़ का मिलकर सभी ने काट दिया
वगरना ज़िंदगी से हर हिसाब हो जाता
बस ऐन वक़्त पे फंदा किसी ने काट दिया
हमारे रब्त को हम वक़्त दे नहीं पाए
हमारे रब्त को इस ख़स्तगी ने काट दिया
वो जी रहा है हमारे बग़ैर भी 'कुलदीप'
उसी की बात को आख़िर उसी ने काट दिया
Mahesh Kumar Kuldeep