उल्फ़त में ग़म-ए-यार के हक़दार हमीं हैं
साक़ी तेरी इस मय के तलबगार हमीं हैं
हमने तो वफ़ा की है वफ़ा करते रहेंगे
है जुर्म मुहब्बत तो ख़तावार हमीं हैं
ढूँढेंगे कहाँ तक ये तुम्हें प्यार के क़ातिल
इस शहर में मक़्तल के भी सरदार हमीं हैं
कोई कहे मजनू कोई फ़रहाद पुकारे
इस दौर-ए-मुहब्बत के अलमदार हमीं हैं
Aatish Muradabadi