INAYAT ALI CHISHTI

लोग ऐसे रिफ़ाह करते हैं
दिल की बस्ती तबाह करते हैं

ख़ुद जो आमाल को अमान कहे
अब वो मेरी इसलाह करते हैं

आप के सामने नतीजे हैं
जो भी आलम पनाह करते हैं

वो कहाँ जाए तेरे दर के सिवा
जो तुझी से तिराह करते हैं

हो चुकी ख़त्म ख़्वाहिश–ए–दुनिया
अब तो ज़िक्र–ए–इलाह करते हैं

सारी दुनिया तो नेक–ओ–आबिद है
इक हमीं हैं गुनाह करते हैं

इस तरफ़ बैठा है 'इनायत' और
उस तरफ़ वो निगाह करते हैं
INAYAT ALI CHISHTI