इज़्ज़त को उस ने देखिए नीलाम कर दिया
इक पारसा को शहर में बदनाम कर दिया
गुमनाम शख़्स का भी बड़ा नाम कर दिया
उन की नज़र ने कितना बड़ा काम कर दिया
महफ़िल में आज साक़ी की पहुँचा तो ये हुआ
उस ने मिरे सुपुर्द भी इक जाम कर दिया
ख़ुद को बचा के चल दिया हर एक जुर्म से
मुझ को ही उस ने मौरिद-ए-इल्ज़ाम कर दिया
बीमार को क़रार न था एक पल मगर
दीदार-ए-हुस्न-ए-यार ने आराम कर दिया
मख़सूस कोई उस की नज़र में नहीं रहा
उस की नज़र ने फ़ैज़ ओ करम आम कर दिया
फ़ैसल तुझे ख़रीद के जानाँ के इश्क़ ने
कौड़ी के आदमी का बड़ा दाम कर दिया
Faisal Qadri Gunnauri