मेरी पूँजी मेरी असफलताएँ हैं!

तुमने यश, वैभव या स्वर्ण कमाया होगा
मेरी पूँजी मेरी असफलताएँ हैं!

तुमने पुरस्कार को संबल माना होगा
मुझको तिरस्कार ने गले लगाया है
तुमने उत्सव रचे प्रदर्शन ही करने को
मैंने सिर्फ़ अकेलापन ही गाया है

तुमने हर सुख चीख-चीखकर गाया होगा
मेरे भीतर अनबोली भाषाएँ हैं!

पीड़ाओं ने जब कोई संगीत बजाया
असफलताएँ झूम-झूमकर नाची हैं
हर दिन होते घोर निराशा के उत्सव में
मैंने मन की सभी व्यथाएँ बाँची हैं

दृश्य देखकर हर सुख भी शरमाया होगा
सुख के नर्तन की अपनी सीमाएँ हैं!

हर आँसू में मेरे सौ-सौ सपन घुले हैं
हर आँसू हीरे की तरह सहेजा हमने
इस सागर में कहीं कला को रतन मिलेंगे
हर दुविधा को धन्यवाद ही भेजा हमने

मन ने मन को मन में ही समझाया होगा
दुख से बढ़कर हर दुख की छायाएँ हैं!
Gyan Prakash Akul