मर जाते मगर कुछ तो रमक़ छोड़ के जाते
सूरज न थे हम वर्ना शफ़क़ छोड़ के जाते
मजबूर नहीं होते अगर प्यास के आगे
हम दिल की ज़मीं पर ही ग़मक़ छोड़ के जाते
जाते हुए कुछ आब ही रख देते नज़र में
सहरा में मुहब्बत का वरक़ छोड़ के जाते
महताब था कोई थे कवाकिब भी वग़रना
किसके लिए हम चर्ख़-ओ-उफ़क़ छोड़ के जाते
Janib Vishal