जब आइनों को भी धुँधला दिखाई देने लगा
मैं अपने आप ही अपनी सफ़ाई देने लगा
सदा ग़रीब की आए कहाँ से कानों तक
अमीर-ए-शहर को ऊँचा सुनाई देने लगा
मुख़ालिफ़ों को मिरे फ़तह क्यों न होती नसीब
मिरे ख़िलाफ़ गवाही जो भाई देने लगा
मरीज़-ए-हिज्र हूँ, आराम वस्ल से होगा
तबीब क्या मिरे ग़म की दवाई देने लगा
कमा के बाप को जिसने दिए न दो आने
वो अपनी साली को जूता चुराई देने लगा
शब-ए-फ़िराक़ जो तन्हाइयों ने तंग किया
मैं अपने यार को फ़ैसल दुहाई देने लगा
Faisal Qadri Gunnauri