Dr Jayhind 'Swatantra'

तीरगी में रौशनी का एक पैकर मिल गया
गुम हुआ इक शख़्स मुझको मेरे अंदर मिल गया

ज़िंदगी में आपसे मिलना हुआ तो यूॅं लगा
मैं था इक दरिया मुझे आख़िर समंदर मिल गया

जो हथेली थी मेरी ख़ाली लकीरों से उसे
आपके हाथों को छूने से मुकद्दर मिल गया

जानता हूँ वो कभी मुझको भुला न पाएगा
भूलने के दावे करता तो वो अक्सर मिल गया

फिर अदावत का मजा भी आएगा 'जयहिन्द' जी
एक दुश्मन गर तुम्हें अपने बराबर मिल गया
Dr Jayhind 'Swatantra'

Dr Jayhind 'Swatantra' | We The Sukhanwar