साथ उनके गुज़ारे हुए लम्हात की ख़ुशबू
आँगन में बसी है मेरे जज़्बात की ख़ुशबू
हम सोचते रहते हैं तेरे बारे में हर पल
ताज़ा हमें रखती है ख़्यालात की ख़ुशबू
जो शहरों में रहते हैं उन्हें ये नहीं मालूम
चेहरों को शगुफ़्ता करे देहात की ख़ुशबू
मस्ती में भरी ज़िन्दगी जब पींग बढ़ाये
झूलों में सिमट आती है बरसात की ख़ुशबू
गुज़री है शब-ए-वस्ल के गुज़री है शब-ए-हिज्र
हर सुबह में होती है हर इक रात की ख़ुशबू
जो ताइर-ए-आज़ाद है उससे कोई पूछे
है कितनी अ़जब मौसम-ए-बरसात की ख़ुशबू
ख़ामोश ही रहते हैं जो कहते नहीं कुछ भी
अश्क़ों में ढली उनके ही जज़्बात की ख़ुशबू
Aatish Muradabadi