कोई आह भी जो निकले दिले ज़ार तक न पहुँचे
ये ख़बर किसी भी सूरत मेरे यार तक न पहुँचे
मेरे पैरों के ये छाले यही कह रहे हैं मुझ से
रहे उम्र भर सफ़र में दर-ए-यार तक न पहुँचे
यही मेरी जुस्तजू है यही मेरी आरज़ू है
जो जले मेरा नशेमन तो गु़बार तक न पहुँचे
तेरी याद में ही गुज़रे मेरी सारी ज़िन्दगानी
ये ख़लिश रहे हमेशा जो क़रार तक न पहुँचे
मैं नज़र से पी रहा हूँ तुझे क्या बताऊँ साक़ी
यही ऐसी मैक़शी है कि ख़ुमार तक न पहुँचे
यही कह रहे हैं सब से ये ख़िज़ा रुतों के मौसम
वो कली-कली नहीं है जो बहार तक न पहुँचे
Aatish Muradabadi