मन की सारी भावना को
मृत्यु का वरदान करके
जा रही हो प्रेयसी तुम
क्यों मुझे निष्प्राण करके
रिक्त आँखों को तुम्हीं ने, प्रेम का सागर किया था
शून्य भावों के हृदय को, चाह का गागर किया था
जा रही सब कामना का
चाह का अवसान करके
जा रही हो प्रेयसी तुम
क्यों मुझे निष्प्राण करके
लड़खड़ाते एक केवट के तरी में त्राण डाला
रास्ते के अश्म में भी, एक छुअन से प्राण डाला
इक अहिल्या को भला क्यों
जा रही पाषाण करके
जा रही हो प्रेयसी तुम
क्यों मुझे निष्प्राण करके
इस नयन को, इस हृदय को बस तुम्हीं से आसरा था
इस सदन का हर किनारा, प्रेम के रस से भरा था
वेदना के किस भवन का
जा रही निर्माण करके
जा रही हो प्रेयसी तुम
क्यों मुझे निष्प्राण करके
उर्वशी तब ही गयी थी जब कोई अनुबंध टूटा
तुम भला जो जा रही हो, क्या कोई सौगंध टूटा
जा रही पावन प्रणय का
आज तुम अपमान करके
जा रही हो प्रेयसी तुम
क्यों मुझे निष्प्राण करके
अब हृदय की पीठिका पर तुम किसे स्थान दोगी
फिर किसी भावना को मृत्यु का वरदान दोगी
जा रही उर्वर हृदय को
तुम कोई शमशान करके
जा रही हो प्रेयसी तुम
क्यों मुझे निष्प्राण करके
Arun Agrawal