Faisal Qadri Gunnauri

मिरे अन्दर हुनर मेरा नहीं है
जुबां में ये असर मेरा नहीं है

ग़मों की भीड़ में तन्हा खड़ा हूँ
कोई भी हमसफ़र मेरा नहीं है

सितम किस दिल से ढाऊँ बे-वफ़ा पर
कि पत्थर का जिगर मेरा नहीं है

ख़फ़ा है मुझसे तो मेहबूब मेरा
ये ख़त-ए-नामाबर मेरा नहीं है

तुझे होने न दूंगा मैं किसी का
ये सुन ले तू अगर मेरा नहीं है

जो हर इक दर पे ख़म हो जाये फ़ैसल
ब-फ़ज़्ल-ए-रब वो सर मेरा नहीं है
Faisal Qadri Gunnauri