पर्वतों से जड़ी कोई ला दे नदी
मेरे दिल का ये पत्थर गला दे नदी
मेरे घर की ज़मीं तेरे सँग बह गयी
अब तो थोड़ा-सा तू खिलखिला दे नदी
तेरी हस्ती हिमालय से बंगाल तक
मैं हूँ बेघर मुझे घर दिला दे नदी
सूखकर ढह गया मेरे दिल का शज़र
आके थोड़ा-सा नम सिलसिला दे नदी
तू मचल के निकलती है कैलाश से
मेरे शंकर वहीं हैं बुला दे नदी
दफ़्न हो जाये नफ़रत ज़माने की, तू
ऐसा कोई बड़ा ज़लज़ला दे नदी
मिल ही जाना है जब एक दिन ख़ाक में
आज ही ख़ाक में तू मिला दे नदी
Prashant Kumar Singh