Prashant Kumar Singh

पर्वतों से जड़ी कोई ला दे नदी
मेरे दिल का ये पत्थर गला दे नदी

मेरे घर की ज़मीं तेरे सँग बह गयी
अब तो थोड़ा-सा तू खिलखिला दे नदी

तेरी हस्ती हिमालय से बंगाल तक
मैं हूँ बेघर मुझे घर दिला दे नदी

सूखकर ढह गया मेरे दिल का शज़र
आके थोड़ा-सा नम सिलसिला दे नदी

तू मचल के निकलती है कैलाश से
मेरे शंकर वहीं हैं बुला दे नदी

दफ़्न हो जाये नफ़रत ज़माने की, तू
ऐसा कोई बड़ा ज़लज़ला दे नदी

मिल ही जाना है जब एक दिन ख़ाक में
आज ही ख़ाक में तू मिला दे नदी
Prashant Kumar Singh

Prashant Kumar Singh | We The Sukhanwar