सुनो प्रिये!
जब तुम लौटोगी शिखर चूमकर,
तब मैं तुमको यहीं मिलूंगा नींव बनाता।
नींद तुम्हें तो आ जायेगी,
पर मैं रहूंगा जागा जागा।
तुम सौभाग्यवती हो जाना,
शायद तब मैं रहूं अभागा।
सुनो प्रिये!
जब घोर अंधेरे छाये होंगे,
तब मैं तुमको यहीं मिलूंगा दीप जलाता।
फिर विपदाएं फिर आशाएं,
आंधी में और तूफानों में।
तुम्हें मिलेंगे राह बनाते,
ऊंची -ऊंची चट्टानों में।
सुनो प्रिये,
जब कंटक रोकें राह तुम्हारी,
तब मैं तुमको यहीं मिलूंगा फूल बिछाता।
मुझे पता है दुनियादारी,
एक दिन तुम पछताओगे ।
जिन पर नेह लुटाते फिरते,
उनके हाथ छले जाओगे ।
सुनो प्रिये,
जब विश्व तुम्हें छलने निकलेगा ,
तब मैं तुमको यहीं मिलूंगा साथ निभाता।
शुभम तिवारी