Archana Dwivedi

विधा- *कजरी*

जियरा हुलसै जैसे सावन की बदरिया।
चला हो सखी झूलि आई न।।
चम-चम चमके मोरी धानी रंग चुनरिया।
चला हो सखी झूलि आई न।।

बागा मोर पपीहा बोले ,
सुनिके मनवा मोरा डोले।
महकै सोंधी माटी,बहै जब बयरिया।
चला हो सखी झूलि आई न।।

झूला परिहैं कदम्ब की डारी,
झुलिहैं मिलिके सखियाँ सारी।
करिहैं हँसी ठिठोली,गैइहैं जब कजरिया,
चला हो सखी झूलि आई न।।

झूला छुहिएँ गगन अटारी,
हरषहिं राधा कृष्ण मुरारी।
आपन गऊवां लागी देवतन कै नगरिया,
चला हो सखी झूलि आई न।।

जब से छूटल नैहर मोर,
शहर बसे हैं सांवर मोर।
नीक लागे नाही हमका अब शहरिया,
चला हो सखी झूलि आई न।।
Archana Dwivedi

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