ग़र हवाएँ इधर नहीं आतीं
ख़ुश्बुएँ पुर-असर नहीं आतीं
शाख़-ए-गुल को जला के कहते हो
तितलियाँ क्यूँ नज़र नहीं आतीं
घर में माँ-बाप ग़र सलामत हैं
फिर बलाएँ भी घर नहीं आतीं
रूठ जाती हैं जब किसी दर से
बरकतें लौट कर नहीं आतीं
हम तड़पते रहे इधर ग़ाफ़िल
हिचकियाँ क्यूँ उधर नहीं आतीं
Anwar gafil