Aliem U khan

साहिल को क्या ख़बर कि समुंदर उदास है
सूरज यहीं पे डूबा है, मंज़र उदास है

हाथों की इन लकीरों में क्यूंकर नहीं हो तुम?
दिल ज़ार-ज़ार रोया, मुक़द्दर उदास है

मेरे लहू का कोई ख़रीदार ही नहीं
क़ातिल भी ग़मज़दा है तो ख़ंजर उदास है

अब चाँद भी फ़लक पे चमकता है इस तरह
रोशन इमारतें हुईं, छप्पर उदास है

जाने कहाँ वो दिन के उजाले चले गए?
बेनूर सुबह-ओ-शाम का पैकर उदास है

हमदर्द हम-नवा तो मिरे पुरसुकून हैं
क्या सोचकर के जाने सितमगर उदास है

हद्द-ए-बयान से परे कुछ दर्द दिल में हैं
बेचैन हैं हुरूफ़, सुख़नवर उदास है

रिश्तों की धूप-छाँव में तन्हा खड़ा "अलीम"
इंसानों के हुजूम में रहकर उदास है
Aliem U khan